हजार से ज्यादा पेट्रोल पंप, ई-चार्जिंग स्टेशन सिर्फ 350; चुनौती- गाड़ियां कहां चार्ज होंगी?
नई दिल्ली. एक तरफ पेट्रोल-डीजल की कीमतें हर दिन
आसमान छू रही हैं, दूसरी तरफ वाहनों से होने वाले प्रदूषण का स्तर भी तेजी
से बढ़ रहा है। दोनों समस्याओं का समाधान आमतौर पर इलेक्ट्रिक वाहनों में
देखा जा रहा है। पब्लिक और पर्सनल ट्रांसपोर्ट में ई-वाहनों की भागीदारी
बढ़ाने को लेकर केंद्र सरकार जितनी तेजी से दावे और योजनाएं बना रही है,
उतनी तेजी से जमीन पर बुनियादी ढांचा खड़ा नहीं हो पा रहा। ई-वाहनों के लिए
चार्जिंग स्टेशन का बड़े नेटवर्क सबसे बुनियादी जरूरत होती है। अभी ये हाल
है कि देश में पेट्रोल पंप की संख्या तो 60 हजार के पार है लेकिन
ई-चार्जिंग स्टेशन महज 350 ही हैं।
सरकार की योजना अगले तीन से पांच साल में चार्जिंग स्टेशनों का नेटवर्क तैयार करने की है। इसके तहत 30 हजार स्लो चार्जिंग स्टेशन और 15 हजार फास्ट चार्जिंग स्टेशन बनाए जाएंगे। शहरों में हर तीन किलोमीटर पर दो हाई चार्जिंग पाइंट और एक फास्ट चार्जिंग पाइंट लगेंगे। हाईवे पर हर 50 किलोमीटर पर एक चार्जिंग पाइंट लगाने की योजना है। ये स्टेशन पब्लिक और प्राइवेट पार्टनरशिप के अलावा कंपनियों द्वारा निजीतौर पर भी लगाए जाएंगे। अकेले दिल्ली जितने बड़े शहर के लिए 3000 चार्जिंग स्टेशनों की जरूरत होगी।
इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर लंबे अरसे में न सरकार ने कदम उठाए, न ही कंपनियों ने। यही वजह है कि भारतीय ग्राहकों के बीच इलेक्ट्रिक वाहन अपनी पैठ नहीं बना पाए हैं। कम ड्राइविंग रेंज, ज्यादा कीमत और पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों की कमी इनके कम लोकप्रिय होने की वजह रही हैं।
ईवी पॉलिसी पर तस्वीर ही साफ नहीं : हीरो इलेक्ट्रिक
हीरो इलेक्ट्रिक के सीईओ सोहिंदर गिल का कहना है कि कुल वाहनों में 30% इलेक्ट्रिक वाहनों का लक्ष्य पाया जा सकता है। इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी दोनों सक्षम हैं। हालांकि, इसके लिए सरकार को एक पुख्ता ईवी पॉलिसी लागू करनी होगी। अभी सरकार की ओर से ही तस्वीर साफ नहीं हैं। पेट्रोल-डीजल वाहनों के लिए हमारे पास पिछले 15 साल से पॉलिसी बनी हुई है। इसमें इंडस्ट्री और स्थितियों के हिसाब से बदलाव होते रहते हैं। इससे इंडस्ट्री को गाइडेंस मिलता रहता है। वहीं, इलेक्ट्रिक व्हीकल के मामले में लॉन्ग टर्म पॉलिसी कम से कम पांच से दस साल के लिए होनी चाहिए। तभी इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री दोनों पूरी तरह से तैयार हो पाएंगी।
गिल कहते हैं- सब्सिडी के मामले में भी कुछ बदलाव करने होंगे। फ्रंट लोडिंग इन्सेंटिव देना होगा। इसमें लंबे वक्त में ज्यादा वाहनों को छोटी-छोटी सब्सिडी देने की बजाय कम वाहनों को ज्यादा सब्सिडी दी जानी चाहिए। इससे सड़कों पर इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ेगी। सड़कों पर ज्यादा ई-व्हीकल्स देखकर लोग भी इन्हें खरीदने के लिए प्रोत्साहित होंगे। बिक्री बढ़ने से इलेक्ट्रिक वाहन सेक्टर में तेजी आएगी और इनके दाम भी नीचे आएंगे। इन इलेक्ट्रिक वाहनों में भी 92 फीसदी हिस्सा ई-बाइक्स, स्कूटर और ई-साइकिल का है। महज 8 फीसदी कारें हैं। आमतौर पर इन्हें घर, गैरेज या दफ्तर पर लगे सामान्य चार्जिंग पॉइंट से ही चार्ज किया जाता है। ई-कार की बात करें तो महिंद्रा ई2ओ जैसी कार को फुल चार्ज होने में 10 यूनिट बिजली खर्च होती है और 5 घंटे लगते हैं। ई-स्कूटर और बाइक को चार्ज होने 1 से 3 यूनिट लगती हैं। भारत में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन में अकेले वाहनों की भागीदारी 24% है। इसके अलावा वायु प्रदूषण का भी सबसे बड़ा स्रोत वाहन ही हैं। फोर्थ लायन टेक्नोलॉजीज के सर्वे में लोगों ने कहा कि महंगे होने के बावजूद वे इलेक्ट्रिक वाहन पर शिफ्ट होना चाहेंगे, लेकिन पब्लिक प्लेस पर चार्जिंग की ज्यादा सुविधाएं न होना इस कदम में सबसे बड़ी रुकावट है। इसके अलावा ई-वाहनों की कम ड्राइविंग रेंज भी बड़ी चुनौती है। ई-वाहनों से सड़कों पर प्रदूषण तो घटेगा, लेकिन इन्हे चार्ज करने के लिए बड़े पैमाने पर बिजली चाहिए होगी। अभी हमारी कुल बिजली उत्पादन क्षमता 3.44 लाख मेगावॉट है। इसमें से 56% यानी 1.96 लाख मेगावाट बिजली का उत्पादन कोयले से चलने वाले पावर प्लांटों में होता है। डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख और नीति आयोग के सदस्य वीके सारस्वत के मुताबिक, पर्यावरण के लिहाज से इलेक्ट्रिक वाहनों को सफल बनाने के लिए सोलर और हाइड्रो प्रोजेक्ट जैसे रिन्यूबल एनर्जी सोर्स से बिजली का उत्पादन बढ़ाना होगा। अभी कुल उत्पादन क्षमता में हाइड्रो पावर की हिस्सेदारी 45 हजार मेगावॉट के साथ 13.2% और सोलर, विंड, बायोमास जैसे दूसरे स्रोतों की क्षमता 70 हजार मेगावॉट है जो 20.5% होती है। भारत के अलावा दुनिया के कई बड़े देशों में ऑटो इंडस्ट्री तेजी से बदल रही है। करीब-करीब हर कंपनी इलेक्ट्रिक कारें तैयार करने पर ध्यान दे रही हैं। अगले सात साल में अकेले भारतीय बाजार में 350 से ज्यादा हैचबैक, सेडान और एसयूवी कारें लॉन्च होंगी। ऑडी और मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू की कई मशूहर लग्जरी कारों के इलेक्ट्रिक अवतार भी बाजार में आएंगे। अंतरराष्ट्रीय शोध संगठन आईसीसीटी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक इलेक्ट्रिक कारों की कीमतें पेट्रोल कारों से कम हो जाएंगी।
सरकार की योजना अगले तीन से पांच साल में चार्जिंग स्टेशनों का नेटवर्क तैयार करने की है। इसके तहत 30 हजार स्लो चार्जिंग स्टेशन और 15 हजार फास्ट चार्जिंग स्टेशन बनाए जाएंगे। शहरों में हर तीन किलोमीटर पर दो हाई चार्जिंग पाइंट और एक फास्ट चार्जिंग पाइंट लगेंगे। हाईवे पर हर 50 किलोमीटर पर एक चार्जिंग पाइंट लगाने की योजना है। ये स्टेशन पब्लिक और प्राइवेट पार्टनरशिप के अलावा कंपनियों द्वारा निजीतौर पर भी लगाए जाएंगे। अकेले दिल्ली जितने बड़े शहर के लिए 3000 चार्जिंग स्टेशनों की जरूरत होगी।
इलेक्ट्रिक वाहनों को लेकर लंबे अरसे में न सरकार ने कदम उठाए, न ही कंपनियों ने। यही वजह है कि भारतीय ग्राहकों के बीच इलेक्ट्रिक वाहन अपनी पैठ नहीं बना पाए हैं। कम ड्राइविंग रेंज, ज्यादा कीमत और पब्लिक चार्जिंग स्टेशनों की कमी इनके कम लोकप्रिय होने की वजह रही हैं।
ईवी पॉलिसी पर तस्वीर ही साफ नहीं : हीरो इलेक्ट्रिक
हीरो इलेक्ट्रिक के सीईओ सोहिंदर गिल का कहना है कि कुल वाहनों में 30% इलेक्ट्रिक वाहनों का लक्ष्य पाया जा सकता है। इंडस्ट्री और टेक्नोलॉजी दोनों सक्षम हैं। हालांकि, इसके लिए सरकार को एक पुख्ता ईवी पॉलिसी लागू करनी होगी। अभी सरकार की ओर से ही तस्वीर साफ नहीं हैं। पेट्रोल-डीजल वाहनों के लिए हमारे पास पिछले 15 साल से पॉलिसी बनी हुई है। इसमें इंडस्ट्री और स्थितियों के हिसाब से बदलाव होते रहते हैं। इससे इंडस्ट्री को गाइडेंस मिलता रहता है। वहीं, इलेक्ट्रिक व्हीकल के मामले में लॉन्ग टर्म पॉलिसी कम से कम पांच से दस साल के लिए होनी चाहिए। तभी इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री दोनों पूरी तरह से तैयार हो पाएंगी।
गिल कहते हैं- सब्सिडी के मामले में भी कुछ बदलाव करने होंगे। फ्रंट लोडिंग इन्सेंटिव देना होगा। इसमें लंबे वक्त में ज्यादा वाहनों को छोटी-छोटी सब्सिडी देने की बजाय कम वाहनों को ज्यादा सब्सिडी दी जानी चाहिए। इससे सड़कों पर इलेक्ट्रिक वाहनों की संख्या कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ेगी। सड़कों पर ज्यादा ई-व्हीकल्स देखकर लोग भी इन्हें खरीदने के लिए प्रोत्साहित होंगे। बिक्री बढ़ने से इलेक्ट्रिक वाहन सेक्टर में तेजी आएगी और इनके दाम भी नीचे आएंगे। इन इलेक्ट्रिक वाहनों में भी 92 फीसदी हिस्सा ई-बाइक्स, स्कूटर और ई-साइकिल का है। महज 8 फीसदी कारें हैं। आमतौर पर इन्हें घर, गैरेज या दफ्तर पर लगे सामान्य चार्जिंग पॉइंट से ही चार्ज किया जाता है। ई-कार की बात करें तो महिंद्रा ई2ओ जैसी कार को फुल चार्ज होने में 10 यूनिट बिजली खर्च होती है और 5 घंटे लगते हैं। ई-स्कूटर और बाइक को चार्ज होने 1 से 3 यूनिट लगती हैं। भारत में होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन में अकेले वाहनों की भागीदारी 24% है। इसके अलावा वायु प्रदूषण का भी सबसे बड़ा स्रोत वाहन ही हैं। फोर्थ लायन टेक्नोलॉजीज के सर्वे में लोगों ने कहा कि महंगे होने के बावजूद वे इलेक्ट्रिक वाहन पर शिफ्ट होना चाहेंगे, लेकिन पब्लिक प्लेस पर चार्जिंग की ज्यादा सुविधाएं न होना इस कदम में सबसे बड़ी रुकावट है। इसके अलावा ई-वाहनों की कम ड्राइविंग रेंज भी बड़ी चुनौती है। ई-वाहनों से सड़कों पर प्रदूषण तो घटेगा, लेकिन इन्हे चार्ज करने के लिए बड़े पैमाने पर बिजली चाहिए होगी। अभी हमारी कुल बिजली उत्पादन क्षमता 3.44 लाख मेगावॉट है। इसमें से 56% यानी 1.96 लाख मेगावाट बिजली का उत्पादन कोयले से चलने वाले पावर प्लांटों में होता है। डीआरडीओ के पूर्व प्रमुख और नीति आयोग के सदस्य वीके सारस्वत के मुताबिक, पर्यावरण के लिहाज से इलेक्ट्रिक वाहनों को सफल बनाने के लिए सोलर और हाइड्रो प्रोजेक्ट जैसे रिन्यूबल एनर्जी सोर्स से बिजली का उत्पादन बढ़ाना होगा। अभी कुल उत्पादन क्षमता में हाइड्रो पावर की हिस्सेदारी 45 हजार मेगावॉट के साथ 13.2% और सोलर, विंड, बायोमास जैसे दूसरे स्रोतों की क्षमता 70 हजार मेगावॉट है जो 20.5% होती है। भारत के अलावा दुनिया के कई बड़े देशों में ऑटो इंडस्ट्री तेजी से बदल रही है। करीब-करीब हर कंपनी इलेक्ट्रिक कारें तैयार करने पर ध्यान दे रही हैं। अगले सात साल में अकेले भारतीय बाजार में 350 से ज्यादा हैचबैक, सेडान और एसयूवी कारें लॉन्च होंगी। ऑडी और मर्सिडीज, बीएमडब्ल्यू की कई मशूहर लग्जरी कारों के इलेक्ट्रिक अवतार भी बाजार में आएंगे। अंतरराष्ट्रीय शोध संगठन आईसीसीटी की रिपोर्ट के मुताबिक, 2025 तक इलेक्ट्रिक कारों की कीमतें पेट्रोल कारों से कम हो जाएंगी।
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